
जैसे मन से शब्द निकलते गए वैसे ही लिखे हैं
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मिलते रहो दोस्तों
ज़िंदगी यूं गुज़र जाएगी
बचपन निकल गया
जवानी के सपने देखते देखते
जवानी गुज़र गई
ज़िंदगी की उलझनों में
मिलते रहो दोस्तों
ज़िंदगी यूँ गुज़र जाएगी
कब बुढ़ापा दबे पाँव चला आया
पता ही नहीं चला
ज़िंदगी जीना रह गया
इसी उलझनो में
मिलते रहो दोस्तों
ज़िंदगी यूँ गुज़र जाएगी
अब सिर्फ़ पुरानी यादों का सहारा है
दोस्तों के साथ वक्त गुज़र जाता हैं
हँसी मज़ाक़ में
मिलते रहो दोस्तों
ज़िंदगी यूँ गुज़र जाएगी
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